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वातावरण दिन के दौरान सूरज से उत्पन्न गर्मी को कैद कर लेता है, और रात के समय उस गर्मी को वापस अंतरिक्ष में जाने से रोक कर, एक ग्लासहाउस की तरह काम करता है। यह कार्य कार्बन डाइ ऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों द्वारा किया जाता है। पर दुख की बात यह है कि, इन ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा तेजी से बढ़ रही है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग के कारण पृथ्वी हमारे लिए खतरनाक रूप से गर्म होती जा रही है। कार्बन के अपघटन में कमी लाने के 3 प्रमुख तरीके हो सकते हैं - कार्बन गहन उत्पादों और सेवाओं के लिए मांग को कम करना, ऊर्जा दक्षता में सुधार करना और सभी क्षेत्रों में डीकार्बोनाइजेशन की तकनीकों को नियोजित करना। गहन कार्बन विखंडन के लिए नवीन प्रौद्योगिकी की आवश्यकता है। विडंबना यह है कि कार्बन से ही डीकार्बोनाइजेशन तकनीक का समाधान सम्भव है। पर आखिर ऐसा क्यों? क्योंकि कार्बन हमारी दुनिया का एक महत्वपूर्ण तत्व है और हनारे आसपास की लगभग हर चीज में पाया जाता है। भारत में कार्बन विज्ञान और प्रौद्योगिकी के समग्र विकास को बढ़ावा देने की दिशा में काम करने वाले प्रमुख संगठनों में से एक है नई दिल्ली में स्थित सी एस आई आर की राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला। एनपीएल ने कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण विकास किया है। आइए कार्बन के विभिन्न रूपों पर एक नजर डालें - कार्बन रेशा, कार्बन पॉलिमर कम्पोजिट, कार्बन-कार्बन कम्पोजिट, कार्बन फोम, उच्च घनत्व ग्रेफाइट, कार्बन नैनोट्यूब, ग्राफीन, कार्बन नैनोफाइबर। संक्षेप में कहा जा सकता है कि वायुमंडल में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए दो तरफा प्रयास जारी हैं। एक, ऊर्जा के उत्पादन और उसके परिवहन में अभिनव कार्बन उत्पादों का उपयोग करना। और दूसरा उत्सर्जित कार्बन डाइ ऑक्साइड को पृथ्वी में गहराई में जमा कर, उसे ग्लोबल वार्मिंग में सहायक बनने से रोकना। वाकई, अब समूची मानवता कार्बन चक्र का संतुलन बिगड़ने के प्रति सचेत हो गई है और इस चक्र को बहाल करके पृथ्वी ग्रह को बचाने का प्रयास कर रही है। "

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