DST-IIG (H)

कुलाबा में पहले चुंबकीय प्रेक्षण सन् 1841 में लिए गए और लंबे समय तक जारी रहे। लेकिन, सन् 1900 ईसवी में कुलाबा में घोड़े से चलने वाली ट्रामों की जगह विद्युतचालित ट्राम शुरू करने का प्रस्ताव रखा गया, जिससे चुंबकीय लेखनों की सटीकता को खतरा उत्पन्न हो गया। इन लेखनों की निरंतरता बनाए रखने के लिए, कुलाबा की ही तरह चुंबकीय स्थितियों वाले अन्य स्थान की खोज करने की ज़रूरत पड़ी। यह काम पहले भारतीय निदेशक डॉ. मूस के नेतृत्व में पूरा किया गया, जिन्होंने अलीबाग का रुख किया और यह इस बात पर जोर दिया कि कुलाबा और अलीबाग में एक-साथ चुंबकीय अभिलेखन लिए जाएं। सन् 1971 में, भारत सरकार ने कुलाबा-अलीबाग वेधशाला को स्वायत्त दर्जा दिया, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत जिसे भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान नाम दिया गया और इसे भूचुंबकत्व एवं संबद्ध क्षेत्रों में शोध का कार्य सौंपा गया। भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान या आईआईजी, भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत एक स्वायत्त संस्थान ने कुलाबा-अलीबाग वेधशालाओं की परंपरा को आगे बढ़ाया I इन क्षेत्र परिवर्तनों का अभिलेखन और अध्ययन करने के लिए आईआईजी ने देश के सभी भागों में चुंबकीय वेधशालाएं स्थापित की हैं। आईआईजी के वैज्ञानिक चुंबकीय खनिजों का अध्ययन भूपटल हलचलों, जलवायु एवं पर्यावरण में बदलावों, समुद्री सतह में बदलावों के अलावा भूक्षरण एवं तलछटों के निक्षेपण से संबंधित तटीय प्रक्रियाओं, भूकंपों के बीच मध्यांतर, चुंबकीय क्षेत्र तीव्रता के बदलावों, पुराचुंबकत्व और अन्य कई पहलुओं के लिए करते हैं। आईआईजी के विविध भूकंप-वैज्ञानिक, ऊपरी वायुमंडल एवं आयनमंडल वैज्ञानिक अपनी विशेषज्ञता के तालमेल से भूकंप के पूर्वानुमान के क्षेत्र में कार्यरत हैं। आईआईजी समाज की भलाई के लिए अपनी जानकारी और विशेषज्ञता का उपयोग करके निःशुल्क या सामान्य शुल्क पर परामर्श प्रदान करता है। भारतीय नौसेना एवं वायुसेना के कंपासों का इसकी अलीबाग वेधशाला में अंशांकन किया जाता है। इसरो जैसे संस्थानों के लिए पेलोड चुंबकत्वमापियों के अंशांकन, तेल कंपनियों के लिए विद्युतचुंबकीय सर्वेक्षण, तथा परमाणु प्रतिष्ठानों एवं रक्षा संस्थानों सहित अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में विशेषज्ञता सेवा प्रदान की जाती है। भूतापीय ऊर्जा का पता लगाने एवं उसके दोहन में भी सहायता प्रदान की जाती है। आईआईजी भारतीय हवाई अड्डों के रनवे का अभिविन्यास भी कर रहा है। प्रकृति हमसे तरंगों की भाषा में बोलती है। आईआईजी के वैज्ञानिकों ने इस भाषा के प्रति हमारी समझ को परिष्कृत किया है, जोकि बहुत ही महत्वपूर्ण है, विशेषकर जब हम मानव जीवन के संरक्षण के साथ-साथ अंतरिक्ष एवं पृथ्वी से जुड़े प्रौद्योगिक ढांचे को बचाए रखने और इन प्रौद्योगिकियों का भविष्य संवारने की बात करते हैं।"